(मीणाओ के शौर्य , वीरता , धर्मपरायणता एवम एतिहासिक परिप्रेक्ष्य से ओत पोत मेरी बहुचर्चित कविता ‘आव्हान’ आपके विचारो हेतु प्रस्तुत है )
कविता
विजय सिंह मीणा,
आव्हान
मीन धरा के मीन बांकुरो तुम्हें जगाने आया हुं।
कुटिल कुचाली दुशासनो को आज भगाने आया हुं ।।1।।
मरु मेर और मारवाड से ,सब भूपति दहलाते थे ।
हाड बाढ और माल देश के, पाल तुम्हीं कहलाते थे ।।2।।
मेवपाल बृजपाल राठ के, तुम सच्चे अधिकारी थे ।
बाडमेर गन्धार सुवालक, मीन राज्य के धारी थे ।। 3।।
दूदा और बादा की सन्तति,भाई चारा भूल गई ।
मेदा की हुन्कार आज, निज मन से क्यों निर्मूल हुई ।।4।।
टटवाडा के तुम्हीं वीर थे , नाहन के तुम मर्द महान ।
दुशमन की रणभेरी सुनकर , क्यों बैठे हो बन अनजान।।5।।
हमने सदा दूसरे के दुख, को अपना ही मान लिया ।
राजा हो या रन्क हमेशा, समदरशी सम्मान दिया ।6।।
तन मन से हम धनी रहें हैं,बातों और निज नातो के।
मगर सदैव मात खाई है,अपने इन जज्बातों से ।।7।।
स्वाभिमान श्रन्गार सदा से , रहता आया इस जन का।
आन बान और शान के आगे, कोई मोल नहीं धन का ।।8।।
अफूलों से भी कोमल हैं हम , लोक व्यवहार निभावन में ।
वज्रों से भी अति कठोर हैं, दुश्मन के दावानल मे ।।9।।
लोक रीति और लोक नीति का, सदा- सदा सम्मान किया ।
इनके खातिर लाभ - हानि का,हमने कभी ना भान किया ।।10।।
दानशीलता दयाशीलता के हम कुशल चितेरे है।
नटनी को दे दिया नौलखा,ऐसे दान भतेरे है।।11।।
अपने तो इस रक्त बीज में, कुछ गुण ऐसे हैं भाई।
कभी ना होता नषट स्वयम ही , कर लेता है भरपाई ।।12।।
सिर नीचा कर जीने वाले , का अस्तित्व कहां जग में ।
अधिकारों से वन्चित जन को , कोई ठौर कहां मग में ।।13।।
रही भाग्य की सदा मित्रता , वीरों का ही साथ दिया ।
कायर सन्ग में श्वान विचरते, हड्डी सन्ग निज रक्त पिया।।14।।
भेड और सिंहों का अन्तर , सर्व विदित होता आया।
पानी पीकर बथुआ भी, गेंहू के सन्ग में गर्माया ।।15।।
विगत पचासों वर्षो से , पाषाण व्रष्टी अविराम रही ।
वो शिलाखन्ड से आहत हैं, हम फ़ूल फ़ेंकते थके नहीं ।।16।।
कैसे गाऊं गीत आज में, मीन धरा अनुरागों के ।
आस्तीन में दन्श अनेकों, विषधर काले नागों के ।। 17 ।।
बिखर जायेगा स्वप्न हमारा , जयचन्दों की आहट से ।
सन्तति का उद्दार नहीं है, अपनी निज कड्वाहट से ।। 18।
अधिकारों पर घात लगाये, गिद्ध खडे दरबारों में।
चाल कुचाली खेल रहे है, विष उगलें अखबारों में ।।19।।
आज राज भी विमुख हमारे , विमुख फ़ैसले लेता है ।
गूलर का फ़ल तो सदैव ही, कीट पतन्गे देता है ।।20।।
हे मत्स्य महाशक्ति तुम्हारी ,सन्स्कृति पर बादल छाये ।
शन्खनाद शत्रु का सुनकर , फ़िर भी बैठे सुस्ताये ।।21।।
चाल बहुत गहरी है मित्रो, अब सचेत हो जाना है ।
गहरी नदी धार चन्चल है, अन्गद पांव जमाना है ।।22।
सन्तति का लेकर नवविचार ,अब तुम्हैं मार्ग चुनना होगा।
विषम घडी में आज मीनवर , तुम्हैं गरल पीना होगा ।।23।।
अब भी समय नहीं गुजरा है, विजय सिंह की बातों का।
एक छत्र के नीचे आओ, दो जवाब प्रतिघातों का ।।24।।
आडावल की अटल धरा पर , भ्रात प्रेम भरना होगा।
क्षेत्रवाद दलगत नीति को, विस्मृत अब करना होगा ।।25।।
बूंदा की ओजस्वी वाणी , कानों में भरनी होगी ।
मेदा की वो अटल प्रतिज्ञा,तुम्हें याद करनी होगी ।।26।।
दबती सांसो के समीर को , अन्गडाई लेनी होगी।
अलसाई आंखो में भी अब , रक्तधार भरनी होगी ।।27।।
बदलेगा रन्ग आसमान का, वायु मन्द हो जायेगी.
उगती किरणे आज धरा पर, ज्वालामुखी बन जायेगी।28।
अधिकारो के लिये भले ही , चाहे मस्तक कट जाये .
हक को विस्म्रत नहीं करेगे , चाहे अम्बर फट जाये ।29।
सदा मौत के मुख पर हम तो , पैर जमाकर छलते है .
म्रत्यु से जीवन को छीना , इसिलिये नहीं डरते है ।30।
आघातो से हम नहीं टूटे ,टूटा करते है दरपण .
पीछे हटना कभी ना सीखा, शीस भले ही हो अर्पण ।31।
बैर भाव को छोड भुला दो,पिछली छद्म कहानी को.
अधिकारो की रक्षा हित , न्योछावर करो जवानी को ।32।
विजय सिंह मीणा
उप निदेशक (राजभाषा)
मोबाइल 09968814674